एक्स्पेक्टैशन
"मम्मा आज का दिन नहीं जाऊँ तो चलेगा क्या बैडमिंटन कोर्ट"?बहुत थकान लग रही है शायद फीवर है, श्रीजा थके हुए स्वर में बात कर रही थीं।
"क्या हुआ तुझे मम्मा ने पास आकर सिर पे हाथ रखते हुए पूछा "?हम्म सिर थोड़ा गरम है पर कोई बात नहीं, मुंह हाथ धोकर आ अच्छा लगेगा। मैंने आज तेरी पसंद का रवा डोसा बनाया है खा लेना फिर मै तुझे दवा देती हूँ, देख आधे घंटे में अच्छा लगेगा तुझे फिर तू बैडमिंटन कोर्ट चली जाना ,ओके?
शलाका ने उसे अपने तरीके से समझाया।
बेचारी श्रीजा मम्मा के सामने कुछ बोल नहीं पातीं थीं, पता था उसे कुछ भी हो जाए मम्मा अपनी ज़िद नहीं छोड़ेगी
आज बहुत कमजोरी लग रही थी उसे, उसकी पसंद का रवा डोसा भी टेस्ट लेस लग रहा था जैसे वैसे खत्म करके बिस्तर पर लेटतें ही आँख लग गयी उसकी।ठीक आधे घंटे में शलाका ने उसे उठाकर बैडमिंटन कोर्ट भेज दीया।
श्रीजा के जाते ही कुछ ही देर में शलाका के फोन की घंटी बजी, बैडमिंटन खेलते हुए श्रीजा बेहोश होकर गिर पड़ी उसे तुरंत अस्पताल ले जाया गया। डाक्टर का कहना है ओवर स्ट्रेस की वजह से उसे यह प्रोब्लम हो गयी है ।
अब प्रिलिअम सर पे है श्रीजा अस्पताल में बेहोश पड़ी है और श्रीजा के साथ साथ उसकी प्रिलिअमस् का क्या होगा यह चिंता भी उसके मम्मा पापा को सता रही है।
यहा श्रीजा एक उदाहरण मात्र है।उसके जैसे कई सारे किशोर उम्र के बच्चे इतनी कम उम्र में स्ट्रेस जैसी प्रोब्लम से झुंझ रहे हैं। 10वी ,12वी के बोर्ड एक्साम के लिए पेरेंटस् बच्चे पे इतना स्ट्रेस देते है कि वो अपने बच्चों की क्षमता ही भूल जाते हैं। हर वक्त पढ़ाई का हंटर साथ में लेते धुमते है ।हर सबजेक्ट के लिए एक्स्ट्रा ट्यूशन, दिन भर के पढ़ाई का टाइम टेबल उसमें थोड़ा भी टाइम यहां वहां नहीं होना चाहिए।अपने बच्चे को मेडिकल कॉलेज या डीग्री इंजीनियरिंग ही करवानी है।उसके बावजूद एक्स्ट्रा करिक्युलर एक्टिविटीज, स्पोर्ट्स में भी अव्वल होना चाहिए।
इतना काफी नहीं है तो अपने दोस्त अपने सगे संबंधियों के बच्चे कैसे अच्छे नंबर लेकर पास हो गये कहकर उनसे कम्पेअर करना शुरू हो जाता है, यहां तक के बच्चे की पढ़ाई को भी रेपुटेशन से जोड़ दिया जाता है ।इन सब बातों में बच्चे खुद क्या चाहते हैं यह तो कोई सोचता हीं नहीं है।
एक तो वैसे भी यह उम्र में होने वाले शारीरिक और मानसिक बदलाव, उसमें पढ़ाई का टेंशन,पेरेंटस् के एक्स्पेक्टैशन, खुद की केपेब्लीटी हर तरफ से बोझ बन जाता है बच्चे पर।अब सब बच्चे तो अव्वल नहीं आते ना,फिर ये जरूरी थोड़ी है के आपका बच्चा डाॅक्टर, वकील या इंजीनियर ही बनें और कई सारे क्षेत्र है जहाँ अपनी क्षमता अपनी रूचि के हिसाब से अपना अच्छा कैरिअर बना सकते है।
आज कल देखो तो कितने कम उम्र के बच्चे एन्जायटी, डिप्रेशन जैसी मानसिक बीमारी के शिकार है,निर्णय क्षमता का अभाव, आत्मविश्वास की कमी की वजह से आत्महत्या,गलत प्रवृत्तियाँ बढ़ रही है इस तरह जाने अनजाने हम खुद ही हमारे बच्चों की बरबादी का कारण बन रहे हैं।
हर माँ-बाप का सपना होता है अपना बच्चा बड़ा आदमी बने नाम कमाए,लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है कि वो अपनी जिंदगी में एक सफ़ल और नेक इन्सान बने।इसलिए माँ-बाप के साथ साथ बच्चों के अच्छे दोस्त भी बनो।बच्चे क्या चाहते हैं यह समझो। उन्हें यह एहसास दिलाओ के वो आपके लिए स्पेशल हैं फिर अपने एक्स्पेक्टैशन उनके सामने रखो,उनके उपर थोंपो नहीं,चाहे वो कोई डाॅक्टर इंजीनियर बनें ना बने एक अच्छी औलाद अच्छा इन्सान तो जरूर बनेगा।
वृशाली रुकसार 🌸
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