रिश्ते
सात बजके गये कभी इतनी देर नहीं हुई है उसे, अभी तक क्यों नहीं आया वो?आज इंतजार के साथ चिंता सता रही थी।कहीं कुछ ग़लत तो नहीं हुआ होगा उसके साथ?
"नहीं नहीं ऐसा नहीं हो सकता है।
हें भगवान मैं ऐसा क्यों सोंच रहीं हूँ?
भला आदमी है बेचारा, ऐसे खयाल से ही रूह कांप गयी उसकी।
"क्यों नहीं आया अभी तक?"
बुढ़ी ऑखे राह तक रही थी।
जैसे अंधेरा बढ़ रहा था वो बुढ़ी औरत बेचैन हो रही थी।
बार-बार अपनी झोंपड़ी से बाहर निकल कर जहाँ तक नजर जा रही थी वहां तक देखने का प्रयास करती।
ऐसा कई दिनों से चल रहा था।
रोज वो आया करता,बुढ़ीया को खाने का पार्सल देता, चला जाता अब तो उस बुढ़ीया को भी एक आदत सी हो गयी थी उसकी।बाहर अबतक अंधेरा छा गया था।
एक आखिरी प्रयास, बाहर आकर नजर डाल रही थी के,दूर से एक बाइक उसकी तरफ आतीं दिखाई दे रही थी। बाइक उस बुढ़ीया के समीप आकर रूक गयी,"ले बुढ़ीया, खाने का एक पार्सल उसने उसे थमा दिया। "अरे कहाँ गया था बाबा तू?,ठीक तो है ना?बुढ़ीया की कांपती हुई आवाज़ मे फ़िक्र झलक रही थी।
"हाँ बुढ़ीया कुछ जादा काम आ गया था, उसमें ट्रेन भी देरी से चल रही थी।
"अच्छा,बेटा संभल के जानाँ, भगवान तेरा भला करे"।
वो चला गया।
कुछ साल पहले रेलवे स्टेशन के पास पार्किंग स्टैंड पे जहाँ उसकी बाइक रखता था,वहां एक पेड़ के पास खड़ी बुढ़ीया को वो रोज आते जाते देखता था। मांगती कुछ नहीं थी उसके पास,। बस उसे याचक की नजर से देखा करती मुस्कुराती, एक दिन पूँछा उसने बुढ़ीया को,पता चला कोई नहीं है उसके पास उसका अपना कहने जैसा, बुढे थके हुए शरीर से अब कोई काम नहीं होता था। यहां पार्किंग स्टैंड पे आके रोज खड़े रहतीं, कोई कुछ देता तो ले लेती उसीसे गुजारा हो जाता।अब वो रोज स्टेशन पर उतरता बुढ़ीया को खाना देता चला जाता।धीरे-धीरे बुढ़ीया ने भी पार्किंग स्टैंड पे आके खड़े रहेना छोड़ दिया क्यों की अब उसका खाना उसकी झोंपड़ी तक पहुंच जाता था बस यही एक रिश्ता!!!
कोई खून का रिश्ता तो नहीं था दोनों में, फिर भी एक रिश्ता था।
क्या है रिश्तों के मायने?क्या सिर्फ खून के रिश्ते ही रिश्ते होते है ?
सबसे पहले रिश्ता तो माॅ से शुरू होता है हमारा।माता पिता जिनकी वजह से हम इस दुनिया में आते हैं, अपनी पुरी जिंदगी लगा देते हमारी परवरिश में।माता पिता, दादा-दादी, चाचा,बुआ, नाना-नानी, मामा,मासी सारे खून के रिश्ते जो पैदा होने के साथ हमसे जुड़ जाते हैं। जिनको हम कभी अलग नहीं करपाते।फिर भी वक्त आने पर हमारे यही रिश्ते हमारे साथ कैसा व्यवहार करेंगे ये हम नहीं जानते। कभी कोई पूरी जिंदगी माता पिता की सेवा शरण में रहते तो कभी किसीके माता पिता संतान के होते हुए वृध्दावस्था में वृध्दाश्रम में जिंदगी गुजारते नजर आते
[ ] बचपन में हम स्कूल जाना शुरू करते तबसे गुरु-शिष्य के बीच एक रिश्ता बन जाता है हमारा, जहां से हम सही मायने में जिंदगी का 'श्रीगणेशा' करते हैं ,हमारी बचपन की यादों में शिक्षक के साथ जुड़ा हुआ रिश्ता हम कभी नहीं भूल पाते।हमारे बचपन के स्कूल के दोस्त, हमारे शिक्षक उनसे हमारा एक रिश्ता होता है, गुरु और शिष्य का ,दोस्ती का।
[ ] स्कूल के बाद हम काॅलेज या अपना कैरिअर बनाने अलग अलग दिशाओं में चले जाते हैं परन्तु वो स्कूल वाली दोस्ती हमे पूरी जिंदगी याद रहतीं है।आगे चलकर जिंदगी में हमें कितने भी अच्छे दोस्त मिले उनमें वो स्कूल वाली बात नहीं होती।
किशोर अवस्था में किसी के प्रति होनेवाला आकर्षण जिसे हम उस उम्र में प्यार समझते हैं,जरूरी नहीं कि वो रिश्ता आगे भी वैसा ही चले, पर वो प्यार वो रिश्ता वो पहले प्यार का एहसास, कितने पझेसिव रहते है हम उस रिश्ते को लेकर ,आगे चलकर वह प्यार वह रिश्ता जिंदगी के हमसफ़र के रुप मे क़ायम हुआ तो ठीक लेकिन अगर ऐसा नहीं हुआ तो क्या जिंदगी के हमसफ़र के रुप मे जो कोई नया साथी हमें मिलता है तभी उसके साथ हमारा रिश्ता वैसा ही होता है जो उस प्यार वाली लवस्टोरी में होता है?
जैसे हम जिंदगी में आगे बढते हैं जिंदगी के अलग अलग पड़ाव पे हमारी कई लोगों से जानपहचान होतीं हैं कभी हमारी नौकरी हमारा काम इनसे जुड़े हुए लोग जिनसे हम व्यवहारीक रिश्ते रखते है,ऐसे रिश्ते सिर्फ हमारे काम से जुड़े हुए होते है
रिश्ते हमारे जिंदगी के लिए जरूरी होते हैं।मनुष्य ना अकेला रहना चाहता है, ना अकेला रहना पसन्द करता है हर एक रिश्ते की अपनी अहमियत होती हैं।कभी मतलब के रिश्ते तो कभी रिश्तों के मतलब खोजते रहते है हम ,कुछ रिश्ते पूरी जिंदगी साथ चलते तो कुछ बिच में ही दम तोड़ देते,कभी कोई रिश्तोंसे जिंदगी सँवर जाती हैं तो कुछ रिश्ते पूरी जिंदगी के लिए बोझ बन जाते है।इन सबके बावजूद हम रिश्ते मे बंधे रहना पसन्द करते है क्योंकि रिश्तों में कहीं न कहीं वो ताकत होती हैं जो हमारे अच्छे बुरे वक्त में मानसिक रूप से हमे प्रबल बनाते है।
भारतीय संस्कृति में शादी एक पवित्र बंधन है। पति-पत्नी का रिश्ता पवित्र रिश्ता माना जाता है। सात फेरों के साथ लिए गये सात वचन क्या हम सही मायने में जीवन भर निभाते हैं?क्या हम इसीलिए इस रिश्ते में बंधे रहते है की वो हमारे संस्कृति का एक अंग है,या कभी इस रिश्ते से हम उब जाते है मगर हम उसे तोड़ने मे असमर्थ हो जाते हैं क्यों कि समाज के निती नियमों को तोड़ने की हमारी हिम्मत नहीं होती। ऐसे रिश्ते पूरी जिंदगी बस बोझ बनके रह जाते है जिनसे कोई खुश नहीं रह पाता।
हर रिश्ते की अपनी अहमियत होती हैं, हर रिश्ते की अपनी मांग होती हैं, उसे समझ के चलो तो वो रिश्ता निभाना आसान हो जाता है,जैसे हर चीज का मेंटेनन्स होता है वैसे ही रिश्ते को भी संजोए रखने के लिए मेंटेनन्स की जरूरत पड़ती हैं। जरूरत से ज्यादा उम्मीदे और जरूरत से ज्यादा जतन भी रिश्तों को खराब कर देते है ।
जैसे किसी पौधे को खाद और पानी उतना ही दो जिससे वो फूले फलें ।
रिश्ते में सच्चाई होनी चाहिए ,पारदर्शिता होनी चाहिए, यह भी ध्यान रखना चाहिए कि हमारा रिश्ता किसी पे बोझ तो नहीं बन रहा है ,रिश्ते को संभालने की कोशिश दोनों तरफ से होनी चाहिए।
अभी तो इंटरनेट का जमाना है, देश राज्य,धर्म, भाषाओंकी सीमाएं लांघ के किसीसे दोस्ती होती हैं पहचान होती हैं ।सारी दुनिया हमारे क्मप्यूटर ,मोबाइल फोन में सिकूड सी गयी है।इसी के चलते किसीसे मित्रता, प्यार, शादी तो किसी से दिल की गहराइयों वाले रिश्ते बन जाते है।कुछ क़ामयाब कुछ नाकामयाब कितने बेबुनियाद कितने बरबाद!!!!!
हर एक रिश्ते का अपना वजूद होता है अपना नजरिया होता है। सारी उम्र हम इन रिश्तों के मायाजाल में घिरे रहते है। इन्सान प्यार का भूखा होता है,उसकी अपनी मनोदशा के अनुसार भी रिश्ते बनते बिगडते है।कौनसा रिश्ता किस वक्त अहम हो जाएँ और कौनसा रिश्ता बोझ लगे ये हम तय नहीं कर पाते। कभी-कभी वो इन्सान की चाहत, जरूरत और स्वभाव तय करता है ।
किसी के लिए कौनसा रिश्ता सही और कौनसा गलत है ये तय कर पाना मुश्किल है ।जो हमे गलत लगता है वो किसी और की नजर में सही हो,जो हमें सही लगता है वो शायद किसीके नजर में गलत हो सकता है। व्यक्ति की मनोदशा का भी रिश्तों पे प्रभाव रहता है कोई ऊपरी सौंदर्य की ओर आकृष्ट होता है तो किसीको मन की सुन्दरता भांति है।
जैसे' संत तुकाराम ' कहते है "नाही निर्मळ मन ,काय करील साबण"?अगर हमारी अंतरात्मा पवित्र नहीं है तो हमें कोई भी बात पवित्र नहीं लगती। औरों के लिए सही गलत रिश्तोंका हम अनुमान नहीं लगा सकते हैं परन्तु हमारे लिए क्या सही क्या गलत ये समझ के लेना हमारा काम है ।ऐसे लोगों से रिश्ते बनाओ जिनसे हमें आंतरिक खुशी मिले।सकारात्मक सोच सकारात्मक नजरिया रखो।अपने लिए अहम है सही है उन रिश्तों को संभालो। औरों के प्रति नजरिया सही रखो।समय के साथ चलो।
वृषाली रूख्सार🌸
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बहुत अच्छा लिखा आपने
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